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mahabharat 12.67.14: अराजक देश में पापी लोग भी कभी शांति से नहीं रह सकते। दो लोग मिलकर एक व्यक्ति का धन छीन लेते हैं और उन दोनों का धन दूसरे लुटेरे लूट लेते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 67: राष्ट्रकी रक्षा और उन्नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.67.14 
पापा ह्यपि तदा क्षेमं न लभन्ते कदाचन।
एकस्य हि द्वौ हरतो द्वयोश्च बहवोऽपरे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अराजक देश में पापी लोग भी कभी शांति से नहीं रह सकते। दो लोग मिलकर एक व्यक्ति का धन छीन लेते हैं और उन दोनों का धन दूसरे लुटेरे लूट लेते हैं।
 
Even sinful people can never live peacefully in a chaotic country. Two people together take away the wealth of one person and the wealth of both of them is looted by other robbers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)