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mahabharat 12.65.35: हे नरसिंह! निष्पाप युधिष्ठिर! सृष्टिकर्ता की यह आज्ञा (राजधर्म) प्राचीन काल में प्रचलित थी और पूर्वकाल के महापुरुषों का परम आधार रही है। तुम्हें भी इसका पालन करना चाहिए। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि तुम क्षत्रियधर्म के इस मार्ग पर चलने में पूर्णतः समर्थ हो।॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 12.65: इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 65: इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.65.35 
आदौ प्रवर्तिते चक्रे तथैवादिपरायणे।
वर्तस्व पुरुषव्याघ्र संविजानामि तेऽनघ॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे नरसिंह! निष्पाप युधिष्ठिर! सृष्टिकर्ता की यह आज्ञा (राजधर्म) प्राचीन काल में प्रचलित थी और पूर्वकाल के महापुरुषों का परम आधार रही है। तुम्हें भी इसका पालन करना चाहिए। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि तुम क्षत्रियधर्म के इस मार्ग पर चलने में पूर्णतः समर्थ हो।॥ 35॥
 
O lion of men! Sinless Yudhishthira! This command of the Creator (Rajdharma) was prevalent in ancient times and remained the ultimate support of the great men of the past. You too should follow the same. I know very well that you are fully capable of following this path of Kshatriyadharma.॥ 35॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रमान्धातृसंवादे पञ्चषष्टितमोऽध्याय:॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और मान्धाताका संवादविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)