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श्लोक  12.65.11 
यो विकर्मस्थितो विप्रो न स सम्मानमर्हति।
कर्म स्वं नोपयुञ्जानमविश्वास्यं हि तं विदु:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण कर्तव्य के विपरीत कर्म करता है, वह सम्मान पाने का अधिकारी नहीं है। जो ब्राह्मण अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह अविश्वसनीय माना जाता है।॥11॥
 
A Brahmin who is engaged in the opposite of duty is not entitled to receive any respect. A Brahmin who does not perform his duty is considered untrustworthy.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)