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mahabharat 12.65.10: जो ब्राह्मण इसके विपरीत आचरण करता है, उसके लिए ब्राह्मण-सदृश कोई वृत्ति नहीं रखी जाती। कर्म से ही धर्म बढ़ता है। मनुष्य जैसा धर्म अपनाता है, वैसा ही बन जाता है।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.65: इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 65: इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.65.10 
अन्यथा वर्तमानस्य नासौ वृत्ति: प्रकल्प्यते।
कर्मणा वर्धते धर्मो यथाधर्मस्तथैव स:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण इसके विपरीत आचरण करता है, उसके लिए ब्राह्मण-सदृश कोई वृत्ति नहीं रखी जाती। कर्म से ही धर्म बढ़ता है। मनुष्य जैसा धर्म अपनाता है, वैसा ही बन जाता है।॥10॥
 
For a Brahmin who behaves contrary to this, no Brahmin-like profession is arranged for him. Dharma (religion) grows only by action. A person becomes like the kind of Dharma he follows.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)