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mahabharat 12.64.7-8: राजन्! सम्पूर्ण जगत अपने उत्तम चरित्र (धर्म) सहित राजधर्म में सम्मिलित है। यह मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ। एक समय की बात है, अनेक वीर राजाओं ने सर्वव्यापी, समस्त प्राणियों के स्वामी, अत्यंत तेजस्वी भगवान नारायण देव की शरण ली थी।   |   mahabharat अध्याय 12.64: राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 64: राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  12.64.7-8 
राजधर्मेष्वनुमता लोका: सुचरितै: सह।
उदाहृतं ते राजेन्द्र यथा विष्णुं महौजसम्॥ ७॥
सर्वभूतेश्वरं देवं प्रभुं नारायणं पुरा।
जग्मु: सुबहुश: शूरा राजानो दण्डनीतये॥ ८॥
 
 
अनुवाद
राजन्! सम्पूर्ण जगत अपने उत्तम चरित्र (धर्म) सहित राजधर्म में सम्मिलित है। यह मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ। एक समय की बात है, अनेक वीर राजाओं ने सर्वव्यापी, समस्त प्राणियों के स्वामी, अत्यंत तेजस्वी भगवान नारायण देव की शरण ली थी।
 
King! The entire world with its good character (dharma) is included in the royal duty. I have already told you this. Once upon a time, many valiant kings had sought refuge in the omnipresent Lord Narayana Dev, the master of all beings, who is extremely radiant. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)