श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 64: राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.64.30 
सर्वधर्मपरं क्षात्रं लोकश्रेष्ठं सनातनम्।
शश्वदक्षरपर्यन्तमक्षरं सर्वतोमुखम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार क्षत्रिय धर्म संसार के सभी धर्मों में श्रेष्ठ है, यह अनादि, नित्य, अविनाशी और सर्वतोभावेन मोक्ष की ओर ले जाने वाला है ॥30॥
 
In this way, Kshatriya religion is the best among all the religions in the world, it is eternal, eternal, imperishable and all-round leading to salvation. 30॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वर्णाश्रमधर्मकथने चतु:षष्टितमोऽध्याय:॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वर्णाश्रमधर्मका वर्णनविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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