श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 64: राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.64.20 
क्षात्राद् धर्माद् विपुलादप्रमेया-
ल्लोका: प्राप्ता: स्थापितं स्वं यशश्च।
धर्मो योऽसावादिदेवात् प्रवृत्तो
लोकश्रेष्ठं तं न जानामि कर्तुम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
विशाल एवं अथाह क्षात्रधर्म के प्रभाव से मैंने उत्तम लोकों को प्राप्त किया तथा अपना यश सर्वत्र प्रचारित एवं प्रसारित किया; परंतु आदिदेव भगवान विष्णु ने मुझे जो धर्म बताया है, उसका आचरण करना मैं नहीं जानता॥20॥
 
With the influence of the vast and immeasurable Kshatradharma, I attained the best worlds and propagated and spread my fame everywhere; But I do not know how to practice the religion that has been taught to me by the Adidev Lord Vishnu. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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