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श्लोक 12.64.20  |
क्षात्राद् धर्माद् विपुलादप्रमेया-
ल्लोका: प्राप्ता: स्थापितं स्वं यशश्च।
धर्मो योऽसावादिदेवात् प्रवृत्तो
लोकश्रेष्ठं तं न जानामि कर्तुम्॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| विशाल एवं अथाह क्षात्रधर्म के प्रभाव से मैंने उत्तम लोकों को प्राप्त किया तथा अपना यश सर्वत्र प्रचारित एवं प्रसारित किया; परंतु आदिदेव भगवान विष्णु ने मुझे जो धर्म बताया है, उसका आचरण करना मैं नहीं जानता॥20॥ |
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| With the influence of the vast and immeasurable Kshatradharma, I attained the best worlds and propagated and spread my fame everywhere; But I do not know how to practice the religion that has been taught to me by the Adidev Lord Vishnu. 20॥ |
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