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mahabharat 12.64.12-13h: राजेन्द्र! उन दिनों मान्धाता नाम का एक पराक्रमी पृथ्वी-प्रेमी राजा था, जिसने आदि, मध्य और अन्त से रहित भगवान नारायणदेव के दर्शन पाने की इच्छा से यज्ञ किया॥12 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.64: राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.64.12-13h 
बभूव राजा राजेन्द्र मान्धाता नाम वीर्यवान्।
पुरा वसुमतीपालो यज्ञं चक्रे दिदृक्षया॥ १२॥
अनादिमध्यनिधनं देवं नारायणं प्रभुम्।
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उन दिनों मान्धाता नाम का एक पराक्रमी पृथ्वी-प्रेमी राजा था, जिसने आदि, मध्य और अन्त से रहित भगवान नारायणदेव के दर्शन पाने की इच्छा से यज्ञ किया॥12 1/2॥
 
Rajendra! In those days, there was a mighty earth-loving king named Mandhata, who performed a yagya with the desire to get the darshan of Lord Narayandev, who was without beginning, middle and end. 12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)