| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 12.63.4  | शूद्रो राजन् भवति ब्रह्मबन्धु-
र्दुश्चारित्रो यश्च धर्मादपेत:।
वृषलीपति: पिशुनो नर्तनश्च
राजप्रेष्यो यश्च भवेद् विकर्मा॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | राजन! जो ब्राह्मण दुश्चरित्र है, अधार्मिक है, शूद्र जाति की वेश्या से सम्बन्ध रखता है, चुगलखोर है, नर्तक है, राजसेवक है तथा अन्य गलत कर्म करता है, वह ब्राह्मणत्व से गिरकर शूद्र हो जाता है॥4॥ | | | | Rajan! The Brahmin who has bad character, is irreligious, has relations with a prostitute woman of Shudra caste, is a gossiper, is a dancer, is a royal servant and does other wrong deeds, he falls from Brahminhood and becomes a Shudra. 4॥ | | ✨ ai-generated | | |
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