श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  12.63.12-13 
शुश्रूषाकृतकार्यस्य कृतसंतानकर्मण:।
अभ्यनुज्ञातराजस्य शूद्रस्य जगतीपते॥ १२॥
अल्पान्तरगतस्यापि दशधर्मगतस्य वा।
आश्रमा विहिता: सर्वे वर्जयित्वा निराशिषम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! जो शूद्र तीनों वर्णों की सेवा करके संतुष्ट हो गया हो, जिसके पुत्र उत्पन्न हो गए हों, जिसमें तीनों वर्णों की अपेक्षा शुचिता और सदाचार का बहुत कम अंतर हो, अथवा जो मनु द्वारा बताए गए दस धर्मों का पालन करने में तत्पर हो, यदि वह शूद्र राजा की अनुमति प्राप्त कर ले, तो उसके लिए संन्यास को छोड़कर शेष सभी आश्रम निर्धारित हैं॥12-13॥
 
Prithvi Nath! A Shudra who has been satisfied by serving all the three Varnas, who has begotten a son, who has very little difference in cleanliness and good conduct compared to the other three Varnas, or who has been prompt in following the ten Dharmas prescribed by Manu, if that Shudra obtains the permission of the king, then all the Ashramas except Sannyasa are prescribed for him.॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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