श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.63.11 
यश्च त्रयाणां वर्णानामिच्छेदाश्रमसेवनम्।
चातुराश्रम्यदृष्टांश्च धर्मांस्तान् शृणु पाण्डव॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! जो राजा अपने राज्य में तीनों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) से शास्त्रविहित आश्रम-धर्म का पालन करवाना चाहता है, उसके लिए मैं चारों आश्रमों के लिए हितकर धर्म का वर्णन कर रहा हूँ। सुनो॥11॥
 
O son of Pandu! For a king who wants all the three castes (Brahmin, Kshatriya and Vaishya) in his kingdom to follow the Ashrama-Dharma as prescribed in the scriptures, I am describing to him the Dharma that is useful for all the four Ashramas. Listen. ॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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