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mahabharat 12.62.6-7: जो ब्राह्मण यज्ञ करने और करवाने, अध्ययन करने और अध्यापन करने, दान लेने और देने - इन छह कार्यों में लगा रहता है, जो चारों आश्रमों में स्थित होकर अपने सभी कर्तव्यों का पालन करता है, जो धर्म के कवच से सुरक्षित है और अपने मन को वश में रखता है, जिसके मन में कोई इच्छा नहीं है, जो भीतर और बाहर से शुद्ध है, तप में तत्पर है और उदार है, वह अविनाशी लोक को प्राप्त करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.62: ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 62: ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.62.6-7 
षट्कर्मसम्प्रवृत्तस्य आश्रमेषु चतुर्ष्वपि।
सर्वधर्मोपपन्नस्य संवृतस्य कृतात्मन:॥ ६॥
ब्राह्मणस्य विशुद्धस्य तपस्यभिरतस्य च।
निराशिषो वदान्यस्य लोका ह्यक्षरसम्मिता:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण यज्ञ करने और करवाने, अध्ययन करने और अध्यापन करने, दान लेने और देने - इन छह कार्यों में लगा रहता है, जो चारों आश्रमों में स्थित होकर अपने सभी कर्तव्यों का पालन करता है, जो धर्म के कवच से सुरक्षित है और अपने मन को वश में रखता है, जिसके मन में कोई इच्छा नहीं है, जो भीतर और बाहर से शुद्ध है, तप में तत्पर है और उदार है, वह अविनाशी लोक को प्राप्त करता है।
 
A Brahmin who is engaged in the six activities of performing and getting the sacrifices performed, studying and teaching, taking and giving donations, who is situated in the four ashramas and performs all their duties, who is protected by the armor of religion and keeps his mind under control, who has no desires in his mind, who is pure from within and outside, is devoted to austerity and is generous, attains the imperishable world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)