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अन्तवन्ति प्रधानानि पुरा श्रेयस्कराणि च।
स्वकर्मनिरतो लोके ह्यक्षर: सर्वतोमुख:॥ ११॥
अनुवाद
पूर्वजन्म के शुभ-अशुभ कर्म ही इस शरीर को उत्पन्न करने वाले मुख्य हैं और इसी शरीर के साथ उनका अंत भी होता है; परंतु जो मनुष्य अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करने में सदैव तत्पर रहता है, वह प्रत्येक स्थिति में सर्वव्यापी और अमर है ॥11॥
The auspicious and inauspicious deeds of the past are the main ones which create this body. They also end with this body; but a man who is always ready to follow his duties as per his Varna and Ashrama is omnipresent and immortal in every situation. ॥11॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वर्णाश्रमधर्मकथने द्विषष्टितमोऽध्याय:॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वर्णाश्रमधर्मका वर्णनविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥