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mahabharat 12.61.5: वहाँ धार्मिक व्यक्ति को आरण्यक शास्त्रों का अध्ययन कर वानप्रस्थ धर्म का पालन करना चाहिए। तत्पश्चात ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उस आश्रम को त्याग देना चाहिए और विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार संन्यास धारण करने वाला मनुष्य अमर ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। 5॥   |   mahabharat अध्याय 12.61: आश्रम-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 61: आश्रम-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.61.5 
तत्रारण्यकशास्त्राणि समधीत्य स धर्मवित्।
ऊर्ध्वरेता: प्रव्रजित्वा गच्छत्यक्षरसात्मताम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ धार्मिक व्यक्ति को आरण्यक शास्त्रों का अध्ययन कर वानप्रस्थ धर्म का पालन करना चाहिए। तत्पश्चात ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उस आश्रम को त्याग देना चाहिए और विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार संन्यास धारण करने वाला मनुष्य अमर ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। 5॥
 
There, a religious person should study the Aranyaka Shastras and follow Vanaprastha Dharma. After that, one should leave that ashram by observing celibacy and formally take sannyasa. In this way, a man who takes renunciation attains the immortal Brahmabhava. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)