Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.61.21: अधिकार जताकर आचरण मत करो; शत्रुता रखने वालों की संगति मत करो। हे युधिष्ठिर! ब्रह्मचारी के लिए यही वांछित आश्रम धर्म है। 21। | mahabharat अध्याय 12.61: आश्रम-धर्मका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न चरत्यधिकारेण सेवेत द्विषतो न च।
एषोऽऽश्रमपदस्तात ब्रह्मचारिण इष्यते॥ २१॥
अनुवाद
अधिकार जताकर आचरण मत करो; शत्रुता रखने वालों की संगति मत करो। हे युधिष्ठिर! ब्रह्मचारी के लिए यही वांछित आश्रम धर्म है। 21।
Do not behave in a display of authority; do not keep company with those who bear enmity. My son Yudhishthira! This is the desired Ashrama Dharma for a Brahmachari. 21.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चतुराश्रमधर्मकथने एकषष्टितमोऽध्याय:॥ ६१॥
इसप्रकार श्रीमहाभारतशान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चारों आश्रमोंके धर्मोंका वर्णनविषयक एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥