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mahabharat 12.61.17: उस गृहस्थ की मृत्यु के पश्चात् उसकी अभीष्ट कामनाएँ चिरकाल तक पूर्ण होती रहती हैं। उस व्यक्ति के संकल्प को जानकर वे चिरकाल तक उसकी सेवा करते रहते हैं, मानो उनके नेत्र, सिर और मुख सब दिशाओं की ओर ही हों।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.61: आश्रम-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 61: आश्रम-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.61.17 
तस्य देहपरित्यागादिष्टा: कामाक्षया मता:।
आनन्त्यायोपतिष्ठन्ति सर्वतोऽक्षिशिरोमुखा:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उस गृहस्थ की मृत्यु के पश्चात् उसकी अभीष्ट कामनाएँ चिरकाल तक पूर्ण होती रहती हैं। उस व्यक्ति के संकल्प को जानकर वे चिरकाल तक उसकी सेवा करते रहते हैं, मानो उनके नेत्र, सिर और मुख सब दिशाओं की ओर ही हों।॥17॥
 
After the death of that householder, his desired desires are fulfilled in an everlasting manner. Knowing the resolve of that person, they serve him for eternity, as if their eyes, head and face are facing all directions.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)