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mahabharat 12.61.16: जो ब्राह्मण इस प्रकार स्वाभाविक रूप से यज्ञ में तत्पर रहता है और गृहस्थ धर्म का भलीभाँति पालन करता है, वह अपने गृहस्थ धर्म को भलीभाँति शुद्ध करके स्वर्ग में शुद्ध फल प्राप्त करता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.61: आश्रम-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 61: आश्रम-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.61.16 
एवं हि यो ब्राह्मणो यज्ञशीलो
गार्हस्थ्यमध्यावसते यथावत्।
गृहस्थवृत्तिं प्रविशोध्य सम्यक्
स्वर्गे विशुद्धं फलमाप्नुते स:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण इस प्रकार स्वाभाविक रूप से यज्ञ में तत्पर रहता है और गृहस्थ धर्म का भलीभाँति पालन करता है, वह अपने गृहस्थ धर्म को भलीभाँति शुद्ध करके स्वर्ग में शुद्ध फल प्राप्त करता है ॥16॥
 
The Brahmin who is thus naturally devoted to Yagya and follows the householder's duty properly, after thoroughly purifying his householder's profession, gets pure fruits in heaven. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)