Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.60.7-8: किसी पर क्रोध न करना, सत्य बोलना, धन का उपभोग करना, क्षमाशील होना, अपनी स्त्री के गर्भ से संतान उत्पन्न करना, भीतर-बाहर से पवित्र रहना, किसी को धोखा न देना, सरलचित्त होना और जो धारण करने योग्य हो, उसका पालन करना - ये नौ धर्म सब वर्णों के लिए उपयोगी हैं। अब मैं तुम्हें केवल ब्राह्मण के धर्म को ही बताता हूँ॥ 7-8॥   |   mahabharat अध्याय 12.60: वर्ण-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 60: वर्ण-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  12.60.7-8 
अक्रोध: सत्यवचनं संविभाग: क्षमा तथा।
प्रजन: स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च॥ ७॥
आर्जवं भृत्यभरणं नवैते सार्ववर्णिका:।
ब्राह्मणस्य तु यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि केवलम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
किसी पर क्रोध न करना, सत्य बोलना, धन का उपभोग करना, क्षमाशील होना, अपनी स्त्री के गर्भ से संतान उत्पन्न करना, भीतर-बाहर से पवित्र रहना, किसी को धोखा न देना, सरलचित्त होना और जो धारण करने योग्य हो, उसका पालन करना - ये नौ धर्म सब वर्णों के लिए उपयोगी हैं। अब मैं तुम्हें केवल ब्राह्मण के धर्म को ही बताता हूँ॥ 7-8॥
 
Not getting angry at anyone, speaking the truth, sharing wealth and enjoying it, being forgiving, having children from one's own wife's womb, being pure from inside and outside, not cheating anyone, being simple-minded and supporting people who are capable of being supported - these nine are the Dharmas useful for all Varnas. Now I am telling you only the Dharma of a Brahmin.॥ 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)