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mahabharat 12.60.45: इस मानसिक यज्ञ को करने वाले यजमान के यज्ञ में देवता और मनुष्य समान रूप से भाग लेने की इच्छा रखते हैं, क्योंकि श्रद्धा के कारण उसका यज्ञ परम पवित्र माना जाता है; अतः श्रद्धा के आधार पर यज्ञ करने का अधिकार सभी जातियों को है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.60: वर्ण-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 60: वर्ण-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.60.45 
नास्य यज्ञकृतो देवा ईहन्ते नेतरे जना:।
तत: सर्वेषु वर्णेषु श्रद्धायज्ञो विधीयते॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
इस मानसिक यज्ञ को करने वाले यजमान के यज्ञ में देवता और मनुष्य समान रूप से भाग लेने की इच्छा रखते हैं, क्योंकि श्रद्धा के कारण उसका यज्ञ परम पवित्र माना जाता है; अतः श्रद्धा के आधार पर यज्ञ करने का अधिकार सभी जातियों को है ॥ 45॥
 
Gods and men alike desire to participate in the sacrifices of a Yajaman who performs this mental sacrifice, because his sacrifice is considered most sacred due to faith; hence, all castes have the right to perform a sacrifice based on faith. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)