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mahabharat 12.60.44: ऋक्, साम और यजुर्वेद को जानने वाला ब्राह्मण सदैव देवता के समान पूजनीय है। दास या शूद्र ऋक्, यजु और सामके ज्ञान से रहित है; फिर भी उसे 'प्रजापत्य' (प्रजापतिका भक्त) कहा गया है। तत्! भरतनन्दन! मानसिक संकल्प से किए जाने वाले भावपूर्ण यज्ञ में सभी वर्णों का अधिकार है। 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.60: वर्ण-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 60: वर्ण-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.60.44 
ऋग्यजु:सामवित् पूज्यो नित्यं स्याद् देववद्द्विज:।
अनृग्यजुरसामा च प्राजापत्य उपद्रव:।
यज्ञो मनीषया तात सर्ववर्णेषु भारत॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
ऋक्, साम और यजुर्वेद को जानने वाला ब्राह्मण सदैव देवता के समान पूजनीय है। दास या शूद्र ऋक्, यजु और सामके ज्ञान से रहित है; फिर भी उसे 'प्रजापत्य' (प्रजापतिका भक्त) कहा गया है। तत्! भरतनन्दन! मानसिक संकल्प से किए जाने वाले भावपूर्ण यज्ञ में सभी वर्णों का अधिकार है। 44॥
 
A Brahmin who knows Rik, Sama and Yajurveda is always worshipable like a god. A Das or Shudra is devoid of the knowledge of Rik, Yaju and Samake; Yet he has been called ‘Prajapatya’ (a devotee of Prajapatika). Tat! Bharatnandan! All varnas have a right in the emotional sacrifice that is performed through mental resolution. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)