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mahabharat 12.60.37: शूद्र के पास अपनी कोई संपत्ति नहीं होती। उसके स्वामी का ही उसके समस्त धन पर अधिकार होता है। भरतनंदन! यज्ञ का अनुष्ठान तीनों वर्णों के लिए तथा शूद्रों के लिए भी आवश्यक बताया गया है। शूद्र के यज्ञ में स्वाहाकार, वष्टकार तथा वैदिक मंत्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। 37॥   |   mahabharat अध्याय 12.60: वर्ण-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 60: वर्ण-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.60.37 
न हि स्वमस्ति शूद्रस्य भर्तृहार्यधनो हि स:।
उक्तस्त्रयाणां वर्णानां यज्ञस्तस्य च भारत।
स्वाहाकारवषट्कारौ मन्त्र: शूद्रे न विद्यते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
शूद्र के पास अपनी कोई संपत्ति नहीं होती। उसके स्वामी का ही उसके समस्त धन पर अधिकार होता है। भरतनंदन! यज्ञ का अनुष्ठान तीनों वर्णों के लिए तथा शूद्रों के लिए भी आवश्यक बताया गया है। शूद्र के यज्ञ में स्वाहाकार, वष्टकार तथा वैदिक मंत्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। 37॥
 
A Shudra does not have any wealth of his own. Its owner has the right over all his money. Bharatnandan! The ritual of Yagya has been said to be necessary for all the three varnas and also for the Shudras. Swahakara, Vashtakara and Vedic mantras are not used in the Yagya of Shudra. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)