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mahabharat 12.60.35-36: यदि स्वामी निःसंतान हो, तो उसकी सेवा करने वाले शूद्र को उसके निमित्त पिण्डदान करना चाहिए । यदि स्वामी वृद्ध या दुर्बल हो, तो उसकी हर प्रकार से सहायता करनी चाहिए । शूद्र को किसी भी विपत्ति में भी अपने स्वामी का परित्याग नहीं करना चाहिए । यदि स्वामी का धन नष्ट हो जाए, तो शूद्र को अपने परिवार के पालन-पोषण के बाद बचे धन से उसका भरण-पोषण करना चाहिए ॥ 35-36॥   |   mahabharat अध्याय 12.60: वर्ण-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 60: वर्ण-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  12.60.35-36 
देय: पिण्डोऽनपत्याय भर्तव्यौ वृद्धदुर्बलौ॥ ३५॥
शूद्रेण तु न हातव्यो भर्ता कस्याञ्चिदापदि।
अतिरेकेण भर्तव्यो भर्ता द्रव्यपरिक्षये॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
यदि स्वामी निःसंतान हो, तो उसकी सेवा करने वाले शूद्र को उसके निमित्त पिण्डदान करना चाहिए । यदि स्वामी वृद्ध या दुर्बल हो, तो उसकी हर प्रकार से सहायता करनी चाहिए । शूद्र को किसी भी विपत्ति में भी अपने स्वामी का परित्याग नहीं करना चाहिए । यदि स्वामी का धन नष्ट हो जाए, तो शूद्र को अपने परिवार के पालन-पोषण के बाद बचे धन से उसका भरण-पोषण करना चाहिए ॥ 35-36॥
 
If the master is childless, then the Shudra who serves him should offer Pind Daan for him. If the master is old or weak, then he should be supported in every possible way. A Shudra should not abandon his master even in any adversity. If the master's wealth is destroyed, then the Shudra should support him with the money left after maintaining his family.॥ 35-36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)