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mahabharat 12.60.14: उसे पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन शिक्षक नहीं बनना चाहिए। उसे अपनी प्रजा का हर संभव तरीके से ध्यान रखना चाहिए। उसे लुटेरों और डाकुओं का वध करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। उसे युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का प्रदर्शन करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.60: वर्ण-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 60: वर्ण-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.60.14 
नाध्यापयेदधीयीत प्रजाश्च परिपालयेत्।
नित्योद्युक्तो दस्युवधे रणे कुर्यात् पराक्रमम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उसे पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन शिक्षक नहीं बनना चाहिए। उसे अपनी प्रजा का हर संभव तरीके से ध्यान रखना चाहिए। उसे लुटेरों और डाकुओं का वध करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। उसे युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का प्रदर्शन करना चाहिए।
 
He should study but should not become a teacher. He should take care of his subjects in every possible way. He should always be ready to kill robbers and bandits. He should display his valour in the battlefield.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)