श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  12.59.105 
यश्च धर्मात् प्रविचलेल्लोके कश्चन मानव:।
निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्ममवेक्षता॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जो कोई धर्म से विमुख हो, उसे अपने बल से परास्त करो और सनातन धर्म पर दृष्टि रखते हुए उसे दण्ड दो ॥105॥
 
'Whoever is deviating from Dharma in this world, defeat him with your strength and punish him while keeping an eye on Sanatan Dharma. ॥105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)