श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  12.59.104 
प्रियाप्रिये परित्यज्य सम: सर्वेषु जन्तुषु।
कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरत:॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
‘प्रियता और अप्रियता का विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और अहंकार को दूर करो और सब प्राणियों के प्रति समान भाव रखो ॥104॥
 
‘Leaving aside the thoughts of likes and dislikes, remove lust, anger, greed and pride and have equal respect for all creatures. ॥ 104॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)