श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 58: भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  12.58.25-26 
वैशम्पायन उवाच
ततो व्यासश्च भगवान् देवस्थानोऽश्म एव च।
वासुदेव: कृपश्चैव सात्यकि: संजयस्तथा॥ २५॥
साधु साध्विति संहृष्टा: पुष्यमाणैरिवाननै:।
अस्तुवंश्च नरव्याघ्रं भीष्मं धर्मभृतां वरम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! भीष्मजी की यह बात सुनकर भगवान व्यास, देवस्थान, अश्मा, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, कृपाचार्य, सात्यकि और संजय बहुत प्रसन्न हुए और हर्ष से खिले हुए मुखों से पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ पुरुष भीष्मजी की बहुत-बहुत प्रशंसा करने लगे। 25-26॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Hearing this statement of Bhishmaji, Lord Vyas, Devsthan, Ashma, Vasudevanandan Shri Krishna, Kripacharya, Satyaki and Sanjay became very happy and with their faces blooming with joy, they started praising Bhishmaji, the best man among the virtuous souls, a lot. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)