श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 58: भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.58.23 
यद्यप्यस्य विपत्ति: स्याद् रक्षमाणस्य वै प्रजा:।
सोऽप्यस्य विपुलो धर्म एवंवृत्ता हि भूमिपा:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
यदि राजा अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए अपने प्राण भी गँवा दे, तो भी यह उसका महान धर्म है। राजाओं का आचरण और आचरण ऐसा ही होना चाहिए॥ 23॥
 
Even if a king loses his life while protecting his subjects, it is still a great dharma for him. The behaviour and conduct of kings should be like this.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)