श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 58: भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.58.18 
एकाङ्गेनापि सम्भूत: शत्रुर्दुर्गमुपाश्रित:।
सर्वं तापयते देशमपि राज्ञ: समृद्धिन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
"चतुर सेना के एक भाग से भी अधिक बलवान शत्रु, दुर्ग में आश्रय लेकर, समृद्ध राजा के सम्पूर्ण देश को भयभीत कर देता है।" ॥18॥
 
"An enemy stronger than even one part of a clever army, taking shelter in a fort, frightens the entire country of a prosperous king." ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)