श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 58: भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.58.17 
न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा।
अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च॥ १७॥
 
 
अनुवाद
बलवान पुरुष को चाहिए कि वह दुर्बल शत्रु की भी कभी उपेक्षा न करे अर्थात् उसे छोटा समझकर उसके प्रति कभी उदासीनता न दिखाए; क्योंकि अग्नि की मात्रा कम होने पर भी वह जलाती है और विष की मात्रा कम होने पर भी वह मार डालती है॥17॥
 
‘A strong man should never disregard even a weak enemy i.e. he should never show indifference towards him considering him small; because even if the amount of fire is small, it burns and even if the amount of poison is less, it kills.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)