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mahabharat 12.57.44-45: जिस प्रकार समुद्र में यात्रा करते समय टूटी हुई नाव को त्याग दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को इन छह व्यक्तियों को त्याग देना चाहिए - एक शिक्षक जो सलाह नहीं देता, एक पुजारी जो वैदिक मंत्रों का पाठ नहीं करता, एक राजा जो उसकी रक्षा नहीं कर सकता, एक स्त्री जो कठोर शब्द बोलती है, एक ग्वाला जो गांव में रहना चाहता है और एक नाई जो जंगल में रहना चाहता है।   |   mahabharat अध्याय 12.57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  12.57.44-45 
षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे।
अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम्॥ ४४॥
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम्।
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार समुद्र में यात्रा करते समय टूटी हुई नाव को त्याग दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को इन छह व्यक्तियों को त्याग देना चाहिए - एक शिक्षक जो सलाह नहीं देता, एक पुजारी जो वैदिक मंत्रों का पाठ नहीं करता, एक राजा जो उसकी रक्षा नहीं कर सकता, एक स्त्री जो कठोर शब्द बोलती है, एक ग्वाला जो गांव में रहना चाहता है और एक नाई जो जंगल में रहना चाहता है।
 
Just as a broken boat is abandoned while traveling the sea, similarly every man must abandon these six persons - a teacher who does not give advice, a priest who does not recite Vedic mantras, a king who cannot protect him, a woman who speaks harsh words, a cowherd who wants to live in a village and a barber who wants to live in the forest.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)