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mahabharat 12.57.28: जो राजा बाहर-भीतर से पवित्र रहता है और अपनी प्रजा का हृदय जीतने का प्रयत्न करता है, वह शत्रुओं द्वारा आक्रमण किए जाने पर भी उनके हाथ नहीं पड़ता। यदि वह गिर भी जाए, तो सहायक पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है। 28.   |   mahabharat अध्याय 12.57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.57.28 
शुचिस्तु पृथिवीपालो लोकचित्तग्रहे रत:।
न पतत्यरिभिर्ग्रस्त: पतितश्चावतिष्ठते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जो राजा बाहर-भीतर से पवित्र रहता है और अपनी प्रजा का हृदय जीतने का प्रयत्न करता है, वह शत्रुओं द्वारा आक्रमण किए जाने पर भी उनके हाथ नहीं पड़ता। यदि वह गिर भी जाए, तो सहायक पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है। 28.
 
A king who remains pure from inside and outside and tries to win the hearts of his subjects, even if attacked by enemies, he does not fall into their hands. Even if he falls, he gets up soon after finding helpers. 28.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)