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mahabharat 12.57.27: जो राजा सब पर संदेह करता है और सबका सब कुछ छीन लेता है, वह लोभी और कुटिल राजा एक दिन शीघ्र ही अपनी ही प्रजा के द्वारा मारा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.57.27 
सर्वाभिशङ्की नृपतिर्यश्च सर्वहरो भवेत्।
स क्षिप्रमनृजुर्लुब्ध: स्वजनेनैव बध्यते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो राजा सब पर संदेह करता है और सबका सब कुछ छीन लेता है, वह लोभी और कुटिल राजा एक दिन शीघ्र ही अपनी ही प्रजा के द्वारा मारा जाता है।
 
A king who doubts everyone and takes away everything from everyone, that greedy and devious king is soon killed by his own people one day. 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)