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mahabharat 12.56.9: हे परंतप के पितामह! हम सभी लोग शास्त्रों के श्रेष्ठ सिद्धांतों को केवल आपसे ही सीख सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी आपको ज्ञान में सर्वश्रेष्ठ मानते हैं॥ 9॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.56.9 
आगमश्च परस्त्वत्त: सर्वेषां न: परंतप।
भवन्तं हि परं बुद्धौ वासुदेवोऽभिमन्यते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे परंतप के पितामह! हम सभी लोग शास्त्रों के श्रेष्ठ सिद्धांतों को केवल आपसे ही सीख सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी आपको ज्ञान में सर्वश्रेष्ठ मानते हैं॥ 9॥
 
O great grandfather of Parantapa! We all can learn the best principles of the scriptures only from you. Even Lord Krishna considers you to be the best in wisdom.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)