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mahabharat 12.56.59: भारत! इन्हें जो भी काम सौंपा जाता है, ये उससे नाराज होकर उसे छोड़ देते हैं। इन्हें जो वेतन मिलता है, उससे ये संतुष्ट नहीं होते और सरकारी धन का गबन करते रहते हैं। 59.   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  12.56.59 
निन्दन्ते स्वानधीकारान् संत्यजन्ते च भारत।
न वृत्त्या परितुष्यन्ति राजदेयं हरन्ति च॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
भारत! इन्हें जो भी काम सौंपा जाता है, ये उससे नाराज होकर उसे छोड़ देते हैं। इन्हें जो वेतन मिलता है, उससे ये संतुष्ट नहीं होते और सरकारी धन का गबन करते रहते हैं। 59.
 
Bharat! Whatever work is entrusted to them, they resent it and leave it. They are not satisfied with the salary given to them and keep embezzling the government money. 59.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)