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mahabharat 12.56.55: वह आम दरबार में बैठकर मित्रों जैसा व्यवहार करते हुए कहता है, "राजा! आपके लिए यह कार्य करना कठिन है, आपका यह आचरण बहुत बुरा है।"   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.56.55 
इदं ते दुष्करं राजन्निदं ते दुष्टचेष्टितम्।
इत्येवं सुहृदो वाचं वदन्ते परिषद्‍गता:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
वह आम दरबार में बैठकर मित्रों जैसा व्यवहार करते हुए कहता है, "राजा! आपके लिए यह कार्य करना कठिन है, आपका यह आचरण बहुत बुरा है।"
 
Sitting in the common court and behaving like friends, he says, "King! It is difficult for you to do this work, this behaviour of yours is very bad."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)