श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  12.56.53 
वान्तं निष्ठीवनं चैव कुर्वते चास्य संनिधौ।
निर्लज्जा राजशार्दूल व्याहरन्ति च तद्वच:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
राजा के सामने वे जम्हाई लेते और थूकते हैं, हे महाराज! वे बातूनी सेवक बिना किसी लज्जा के मनमाना बोलते हैं। 53.
 
In front of the king they yawn and spit, O great king! Those talkative servants speak arbitrarily without any shame. 53.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)