Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.56.48: हे वक्ता श्रेष्ठ, हे राजासिंह! आपको अपने सेवकों के साथ अधिक परिहास नहीं करना चाहिए; इसमें जो दोष है, उसे मुझसे सुनिए।   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.56.48 
परिहासश्च भृत्यैस्ते नात्यर्थं वदतां वर।
कर्तव्यो राजशार्दूल दोषमत्र हि मे शृणु॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
हे वक्ता श्रेष्ठ, हे राजासिंह! आपको अपने सेवकों के साथ अधिक परिहास नहीं करना चाहिए; इसमें जो दोष है, उसे मुझसे सुनिए।
 
O best of speakers, O King Singh! You should not joke too much with your servants; listen to me about the fault in this. 48.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)