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mahabharat 12.56.47: हे पाण्डुपुत्र! तुम्हें कभी धैर्य नहीं खोना चाहिए। जो राजा अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता तथा सदैव धैर्यवान रहता है, वह कभी भयभीत नहीं होता ॥47॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.56.47 
न संत्याज्यं च ते धैर्यं कदाचिदपि पाण्डव।
धीरस्य स्पष्टदण्डस्य न भयं विद्यते क्वचित्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! तुम्हें कभी धैर्य नहीं खोना चाहिए। जो राजा अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता तथा सदैव धैर्यवान रहता है, वह कभी भयभीत नहीं होता ॥47॥
 
O son of Pandu! You should never lose patience. A king who does not hesitate in punishing criminals and is always patient, is never afraid. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)