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mahabharat 12.56.42: हे प्रचुर दक्षिणा देने वाले नरेश्वर! आपको सब प्रकार के व्यसनों का त्याग कर देना चाहिए; परन्तु ऐसा नहीं है कि साहस आदि का पूर्ण उपयोग न किया जाए (क्योंकि शत्रु आदि पर विजय पाने के लिए उसकी आवश्यकता होती है); अतः सब प्रकार के व्यसनों की आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए॥42॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.56.42 
व्यसनानि च सर्वाणि त्यजेथा भूरिदक्षिण।
न चैव न प्रयुञ्जीत सङ्गं तु परिवर्जयेत्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रचुर दक्षिणा देने वाले नरेश्वर! आपको सब प्रकार के व्यसनों का त्याग कर देना चाहिए; परन्तु ऐसा नहीं है कि साहस आदि का पूर्ण उपयोग न किया जाए (क्योंकि शत्रु आदि पर विजय पाने के लिए उसकी आवश्यकता होती है); अतः सब प्रकार के व्यसनों की आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए॥42॥
 
Nareshwar who gives abundant Dakshina! You should give up all kinds of addictions*; But it is not the case that courage etc. should not be used fully (because it is needed for conquering the enemy etc.); Therefore, attachment to all types of addictions should be abandoned. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)