श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.56.40 
तस्मान्नैव मृदुर्नित्यं तीक्ष्णो नैव भवेन्नृप:।
वासन्तार्क इव श्रीमान् न शीतो न च घर्मद:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जैसे वसन्त ऋतु का तेज सूर्य न तो अधिक शीतलता लाता है और न अधिक गर्मी, वैसे ही राजा को भी न तो अधिक कोमल होना चाहिए और न अधिक कठोर ॥40॥
 
Just as the bright Sun of the spring season neither brings too much coolness nor too much heat, similarly a king should neither be too gentle nor too harsh. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)