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mahabharat 12.56.37: बेटा! तुम्हें हर समय और हर जगह क्षमाशील नहीं रहना चाहिए; क्योंकि क्षमाशील हाथी के समान सौम्य स्वभाव वाला राजा दूसरों को डराने में असमर्थ होने के कारण बुराई को फैलाने में सहायक होता है।   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.56.37 
न च क्षान्तेन ते नित्यं भाव्यं पुत्र समन्तत:।
अधर्मो हि मृदू राजा क्षमावानिव कुञ्जर:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
बेटा! तुम्हें हर समय और हर जगह क्षमाशील नहीं रहना चाहिए; क्योंकि क्षमाशील हाथी के समान सौम्य स्वभाव वाला राजा दूसरों को डराने में असमर्थ होने के कारण बुराई को फैलाने में सहायक होता है।
 
Son! You should not remain forgiving all the time and everywhere; because a king with a gentle nature like a forgiving elephant helps in the spread of evil because he is unable to frighten others.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)