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mahabharat 12.56.32-33: प्रजानाथ! यदि इनमें से कोई कलंकित हो तो उस पर भी दया करनी चाहिए। ब्राह्मण को देश से निकाल देने का विधान है, भले ही वह ब्राह्मण-हत्या, व्यभिचार, भ्रूण-हत्या और राजद्रोह जैसे अपराध करता हो - उसे कभी भी शारीरिक दंड नहीं देना चाहिए। 32-33॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  12.56.32-33 
अभिशस्तमपि ह्येषां कृपायीत विशाम्पते।
ब्रह्मघ्ने गुरुतल्पे च भ्रूणहत्ये तथैव च॥ ३२॥
राजद्विष्टे च विप्रस्य विषयान्ते विसर्जनम्।
विधीयते न शारीरं दण्डमेषां कदाचन॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! यदि इनमें से कोई कलंकित हो तो उस पर भी दया करनी चाहिए। ब्राह्मण को देश से निकाल देने का विधान है, भले ही वह ब्राह्मण-हत्या, व्यभिचार, भ्रूण-हत्या और राजद्रोह जैसे अपराध करता हो - उसे कभी भी शारीरिक दंड नहीं देना चाहिए। 32-33॥
 
Prajanath! If any of them is tarnished then we should show mercy on him also. There is a law to expel a Brahmin from the country even if he commits crimes like Brahmin murder, adultery, feticide and treason - he should never be given physical punishment. 32-33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)