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mahabharat 12.56.26: महाराज! ऐसा विचार करके आपको सदैव ब्राह्मणों का अभिवादन करना चाहिए; क्योंकि जब वे श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजित होते हैं, तब वे पृथ्वी के ब्रह्म अर्थात् वेदों को ग्रहण कर लेते हैं॥26॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.56.26 
एवं कृत्वा महाराज नमस्या एव ते द्विजा:।
भौमं ब्रह्म द्विजश्रेष्ठा धारयन्ति समर्चिता:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! ऐसा विचार करके आपको सदैव ब्राह्मणों का अभिवादन करना चाहिए; क्योंकि जब वे श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजित होते हैं, तब वे पृथ्वी के ब्रह्म अर्थात् वेदों को ग्रहण कर लेते हैं॥26॥
 
Maharaj! Thinking like this, you should always greet the Brahmins; Because when those great Brahmins are worshipped, they imbibe the Brahma of the earth i.e. the Vedas. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)