श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.56.17 
न हि सत्यादृते किंचिद् राज्ञां वै सिद्धिकारकम्।
सत्ये हि राजा निरत: प्रेत्य चेह च नन्दति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
राजाओं के लिए सत्य के अतिरिक्त अन्य कोई भी सफलता का स्रोत नहीं है। जो राजा सत्यवादी है, वह इस लोक में भी सुख पाता है और परलोक में भी।॥17॥
 
Nothing other than truth is the source of success for kings. A king who is truthful finds happiness in this world as well as the next.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)