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mahabharat 12.53.7: तत्पश्चात अपनी मर्यादा से कभी विचलित न होने वाले महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण ने शय्या से उठकर स्नान किया, फिर गूढ़ गायत्री मंत्र का जप करके हाथ जोड़कर अग्नि के पास बैठ गए॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.53: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 53: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.53.7 
तत उत्थाय दाशार्ह: स्नात: प्राञ्जलिरच्युत:।
जप्त्वा गुह्यं महाबाहुरग्नीनाश्रित्य तस्थिवान्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात अपनी मर्यादा से कभी विचलित न होने वाले महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण ने शय्या से उठकर स्नान किया, फिर गूढ़ गायत्री मंत्र का जप करके हाथ जोड़कर अग्नि के पास बैठ गए॥7॥
 
After that, the mighty-armed Lord Shri Krishna, who never deviates from his dignity, got up from the bed and took a bath, then after chanting the esoteric Gayatri Mantra, he sat near the fire with folded hands. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)