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mahabharat 12.53.20-21h: रथों पर बैठकर वे सब आपस में बातचीत करते हुए एक-दूसरे का कुशल-क्षेम और रात्रि कैसी बीती, यह पूछते रहे। फिर वे श्रेष्ठ पुरुष अपने उत्तम रथों पर सवार होकर बादलों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि करते हुए वहाँ से चले गए।   |   mahabharat अध्याय 12.53: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 53: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  12.53.20-21h 
रथस्था: संविदं कृत्वा सुखां पृष्ट्वा च शर्वरीम्॥ २०॥
मेघघोषै रथवरै: प्रययुस्ते नरर्षभा:।
 
 
अनुवाद
रथों पर बैठकर वे सब आपस में बातचीत करते हुए एक-दूसरे का कुशल-क्षेम और रात्रि कैसी बीती, यह पूछते रहे। फिर वे श्रेष्ठ पुरुष अपने उत्तम रथों पर सवार होकर बादलों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि करते हुए वहाँ से चले गए।
 
While sitting on the chariots, they all conversed and asked each other about their well-being and how the night had gone by. Then, those best of men left the place in their excellent chariots, making a deep sound like the roar of the clouds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)