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mahabharat 12.53.1: वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! तत्पश्चात् मधुसूदन भगवान श्रीकृष्ण एक सुन्दर शय्या पर आश्रय लेकर शयन करने लगे। जब आधी रात्रि शेष थी, तब वे जागकर बैठ गए।'   |   mahabharat अध्याय 12.53: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 53: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.53.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: शयनमाविश्य प्रसुप्तो मधुसूदन:।
याममात्रार्धशेषायां यामिन्यां प्रत्यबुद्धॺत॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! तत्पश्चात् मधुसूदन भगवान श्रीकृष्ण एक सुन्दर शय्या पर आश्रय लेकर शयन करने लगे। जब आधी रात्रि शेष थी, तब वे जागकर बैठ गए।'
 
Vaishampayana says, 'O Janamejaya! Thereafter, Lord Krishna, the Madhusudan, took shelter on a beautiful bed and went to sleep. When half of the night was yet to pass, he woke up and sat up. 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)