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mahabharat 12.52.7: गोविन्द! ये बाण विष और अग्नि के समान हैं, जो मुझे निरन्तर पीड़ा दे रहे हैं; इसलिए मुझमें कुछ भी कहने की शक्ति नहीं बची है॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.52.7 
न च मे प्रतिभा काचिदस्ति किंचित् प्रभाषितुम्।
पीडॺमानस्य गोविन्द विषानलसमै: शरै:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
गोविन्द! ये बाण विष और अग्नि के समान हैं, जो मुझे निरन्तर पीड़ा दे रहे हैं; इसलिए मुझमें कुछ भी कहने की शक्ति नहीं बची है॥7॥
 
'Govind! These arrows are like poison and fire, causing me constant pain; therefore I have no strength left to say anything. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)