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mahabharat 12.52.21: भीष्म! ज्ञानदृष्टि से संपन्न होकर तुम संसार में फंसे हुए समस्त प्राणी समुदाय को उसी प्रकार सत्यस्वरूप से देख सकोगे, जैसे मछली स्वच्छ जल में सब कुछ देख लेती है।   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.52.21 
संसरन्तं प्रजाजालं संयुक्तो ज्ञानचक्षुषा।
भीष्म द्रक्ष्यसि तत्त्वेन जले मीन इवामले॥ २१॥
 
 
अनुवाद
भीष्म! ज्ञानदृष्टि से संपन्न होकर तुम संसार में फंसे हुए समस्त प्राणी समुदाय को उसी प्रकार सत्यस्वरूप से देख सकोगे, जैसे मछली स्वच्छ जल में सब कुछ देख लेती है।
 
Bhishma! By being endowed with the vision of knowledge, you will be able to see the entire community of living beings trapped in the world in the same true form as a fish sees everything in clear water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)