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mahabharat 12.52.18: भीष्म! बादलों के आवरण से मुक्त चन्द्रमा की भाँति तुम्हारा मन भी सदैव रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होकर सत्त्वगुण में स्थित रहेगा। 18॥   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.52.18 
सत्त्वस्थं च मनो नित्यं तव भीष्म भविष्यति।
रजस्तमोभ्यां रहितं घनैर्मुक्त इवोडुराट्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
भीष्म! बादलों के आवरण से मुक्त चन्द्रमा की भाँति तुम्हारा मन भी सदैव रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होकर सत्त्वगुण में स्थित रहेगा। 18॥
 
Bheeshma! Like the moon freed from the cover of clouds, your mind will always be free from Rajogun and Tamogun and will remain situated in Sattvagun. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)